हरिपुरा अधिवेशन, 1938 भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में एक महत्वपूर्ण पड़ाव था , जहाँ कांग्रेस में मज़बूत हो चुकी दो विचारधाराओं ने एक दूसरे को प्रभावित करने का प्रयास किया। यह केवल गाँधी जी और सुभाष के बीच का मुद्दा नहीं था बल्कि देश तथा कांग्रेस आगे जाकर किस नीतियों पर चलेगी इसका एक निर्णय था। 1938 में, सुभाष चंद्र बोस को हरिपुरा के वार्षिक सत्र के लिए कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था जो नेहरू की अध्यक्षता के बाद समाजवादियों की जीत थी haripura adhiveshan

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संक्षेप में इतिहास

समाजवादियों और अन्य वामपंथियों की आलोचना तब से बढ़ी है जब कांग्रेस कानून भारत शासन अधिनियम, 1935 के तहत चुनावों के लिए जा रही थी। मंत्री पद को स्वीकार करने के निर्णय को आलोचना मिली और कई वैचारिक मुद्दों जैसे ब्रिटैन के प्रति कांग्रेस की नीति , किसान मुद्दे आदि पर फिर दोनों समूहों के बीच मतभेद बढ़ गए।

बाद में, जब सुभाष चंद्र बोस की अध्यक्षता में गुजरात राज्य के हरिपुरा ग्रामीण जिले में 1938 की शुरुआत में वार्षिक कांग्रेस अधिवेशन आयोजित किया गया, तो यह मतभेद विवादों में बदल गया . विवादों के मूल में यह था की कौन सी नीतियाँ, विचारधारा भावी कांग्रेस और देश को बदलेगी। परन्तु यह महत्वपूर्ण था की कांग्रेस फैज़पुर, महाराष्ट्र और हरिपुरा, गुजरात में कांग्रेस अधिवेशन ग्रामीण क्षेत्र में हुए जो समाजवाद का नेतृत्व कर रहे थे .

विचारधाराओं का टकराव स्वाभाविक था। जहां एक और ऊर्जापूर्ण जवाहर लाल और सुभाष थे , जो व्यापक समाजवादी थे और दूसरी ओर कांग्रेस के अनुभवी , बुजुर्ग नेता जैसे गाँधी थे जो अपने आदर्शों के लिए लोकप्रिय थे .

विचारधाराओं के टकराव के बीच, कांग्रेस फरवरी 1938 से विट्ठल नगर हरिपुरा में मिली। इस कांग्रेस के अध्यक्ष सुभाष चंद्र बोस थे। ⁣

1938 तक कांग्रेस में स्पष्ट रूप में क्या विचारधाराएँ बन चुकी थी ?

1938 तक, जवाहर लाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस कांग्रेस के स्पष्ट प्रवक्ता के रूप में उभरे। उसी समय तक, कांग्रेस विचारधारा के आधार पर दो समूहों में विभाजित हो गई थी। एक रूढ़िवादी समूह था और दूसरा कट्टरपंथी था। ⁣कांग्रेस के अंदर समाजवादियों, वामपंथियों और गांधीवादियों के बीच कभी सहमति नहीं थी।

लेकिन कांग्रेस के अंदर ही समाजवादी, साम्यवादी और कट्टर धार्मिक लोग भी मौज़ूद थे। जहाँ एक और सुभाष चन्द्र बोस , जवाहर लाल नेहरू थे जो पक्के समाजवादी और साम्यवाद की और झुके नेता थे, वही दूसरी और महात्मा गाँधी जैसे महान नेता थे जो मूलतः सुभाष और जवाहर की सोच से अलग थे

गांधी जी की सोशलिस्टों के लिए क्या सोच थी ?

जून 1934 में, सोशलिस्ट कांग्रेस के औपचारिक रूप से गठित होने के एक महीने बाद, महात्मा गांधी ने अपनी भूमिका बताते हुए सितंबर में एक पुस्तिका प्रकाशित की। उन्होंने सोशलिस्ट कांग्रेस के गठन का स्वागत किया. लेकिन उन्होंने यह भी लिखा,

“अंत में, इसके कई सदस्य सम्मानित हैं और वे हमारे सहयोगी हैं। लेकिन उन्होंने जो कार्यक्रम प्रकाशित किया है, उसे देखते हुए, उनके साथ हमारे मूलभूत मतभेद हैं.. उनके पास विचार हैं, लेकिन उन्हें व्यक्त करने का अधिकार है। वे कांग्रेस में प्रभावी होंगे और वे होंगे, लेकिन मैं ऐसे कांग्रेस में नहीं रहूंगा,”

महात्मा गांधी

1938 तक गाँधी जी क्यों सक्रिय नहीं थे ?

इस अवधि के दौरान, गांधी सक्रिय राजनीति से लगभग सेवानिवृत्त रहे और उन्होंने हरिजनों के उत्थान का काम किया .⁣

महात्मा गांधी जी और सुभाष चंद्र बोस के बीच क्या मतभेद थे ?

महात्मा गांधी और नेताजी सुभाष चंद्र बोस भारत एक लक्ष्य के साथ दो अलग-अलग व्यक्तित्व थे, लेकिन भारत की स्वतंत्रता के साथ-साथ मुक्त भारत के लिए उनका दृष्टिकोण पूरी तरह से अलग था

  • गाँधी जी अहिंसक और सत्याग्रह में अटूट विश्वास रखते थे जो दुश्मन को उसके बुरे वक़्त में सुधार का मौका देती थी जबकि सुभाष ‘ दुश्मन का दुश्मन को दोस्त ‘ मानते थे .
  • गांधीजी का मानना ​​था कि विश्व युद्ध-II के दौरान ब्रिटेन को निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए, लेकिन नेताजी ने भारत में ब्रिटिश वर्चस्व को नष्ट करने के अवसर के रूप में विश्व युद्ध-II को देखा

हरिपुरा अधिवेशन में सुभाष की क्या भूमिका थी ?

बोस वामपंथी नीतियों को कांग्रेस में सक्रिय बनाना चाहते थे। ये वही रास्ता था जिस पर उनके मित्र जवाहर लाल नेहरू चल रहे थे। बोस का भारत के लोगों में प्रतिरोध की शक्ति विकसित करने का विचार था, क्योंकि ब्रिटिश सरकार ने भारतीय लोगों और कांग्रेस पर संघीय योजना (भारत शासन अधिनियम, 1935) को को लागु करने का दबाव डाला। ⁣ लेकिन यह हरिपुरा सत्र था जब गांधी और बोस के बीच मतभेद ग्रेट ब्रिटेन के प्रति उनके नजरिए पर सामने आए। ⁣

सुभाष चंद्र बोस भारत को द्वितीय विश्व युद्ध में घसीटने की अंग्रेजों की योजना के खिलाफ थे। वह ब्रिटेन की राजनीतिक अस्थिरता से अवगत थे और ब्रिटिशों द्वारा भारत को स्वतंत्रता देने के लिए इंतजार करने के बजाय, इसका लाभ उठाना चाहता थे। जो उनके कथन से स्पष्ट होता है:

“ब्रिटेन का संकट भारत का अवसर है”सुभाष चंद्र बोस

हरिपुरा अधिवेशन में क्या हुआ ?

⁣इस सत्र में एक प्रस्ताव पारित किया गया था। हरीपुरा के प्रस्ताव के अनुसार, ब्रिटेन को 6 महीने का अल्टीमेटम दिया गया था, जिसमे विफल रहने पर नए आंदोलन करने का ज़िक्र था।

गाँधी पक्के वामपंथी आलोचक थे और अहिंसा के पक्के पालक अतः यह प्रस्ताव कुछ ऐसा था जिसे गांधी पचा नहीं सकते थे। सुभाष ने अंग्रेजों को गिराने के लिए गांधी की अहिंसा और सत्याग्रह की रणनीति का समर्थन नहीं किया। इसका नतीजा यह हुआ कि गांधी और बोस के बीच काफी फूट थी। इसी तरह नेहरू भी बोस से अलग हो गए .

यह परिवर्तन तब और बढ़ गया जब सुभाष चंद्र बोस ने राष्ट्रीय योजना समिति का आयोजन किया .⁣
एनपीसी (NPC) भारत के योजना आयोग का अग्रदूत था। यह विचार औद्योगिकीकरण के आधार पर भारत के आर्थिक विकास के लिए एक व्यापक योजना तैयार करने का था। यह गांधी की चरखा नीति के खिलाफ था…

हरिपुरा के बाद त्रिपुरी अधिवेशन में काफी विवाद बाद गए। हम उसे अगले आर्टिकल में शेयर करेंगे..

Courtesy of : TOPICFLIX

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