क्या है धारा विकास कार्यक्रम ?

हिमालयी पर्वतीय क्षेत्रों में पानी के प्रमुख स्रोतों, जलधाराओं एवं झरनों के सूखने के कारण उत्पन्न स्थिति से निपटने के लिये जल शक्ति मंत्रालय ने ‘स्प्रिंग रिजुविनेशन प्रोग्राम’ (धारा विकास कार्यक्रम) की पहल की है ताकि इन सूखते जल स्रोतों को जीवित किया जा सके। इस विषय पर ‘स्प्रिंग रिजुविनेशन का ढांचा दस्तावेज’ तैयार किया गया है जिसमें धारा विकास कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की गई है । दस्तावेज के अनुसार, धारा विकास कार्यक्रम के लिये जल शक्ति मंत्रालय समन्वय करने वाली संस्था है ।

इस उद्देश्य के लिये उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जिले में धारा विकास एवं पुनर्जीवन के लिये एक पायलट परियोजना का प्रस्ताव किया गया है ।

कुछ राज्यों ने इस विषय पर कार्यक्रम शुरू किये हुए हैं । इसमें जहां पर कुछ समानताएं हैं, वहीं ये संबंधित राज्यों की विशिष्ट जलभूगर्भीय, सामाजिक, सांस्कृतिक स्थितियों एवं क्षमताओं के आधार पर विशिष्ट समाधान भी प्रस्तुत करते हैं । ऐसे में इन सभी का समावेश करते हुए समग्र उपाय प्रस्तुत करने की पहल है ।

‘स्प्रिंग रिजुविनेशन के ढांचा दस्तावेज में कहा गया है कि व्यावहारिकता एवं टिकाऊ परिणाम इस कार्यक्रम डिजाइन का मूल तत्व होना चाहिए ताकि दीर्घकाल तक जल सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके । इसमें कहा गया है कि कार्यक्रम में जलभूगर्भीय स्थितियों एवं जल धाराओं पर नियंत्रण का मूल्यांकन करने, जल धाराओं की रिचार्ज क्षमता का पता लगाना, जलधारा की सुरक्षा एवं रखरखाव तथा जल धाराओं से रिचार्ज की प्रभावी तरीके से निगरानी करने पर जोर दिया गया है।

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दस्तावेज में नीति आयोग द्वारा 2018 में स्प्रिंग रिवाईवल के भारतीय हिमालयी क्षेत्र में जलधाराओं की स्थिति पर रिपोर्ट का भी जिक्र किया गया है। नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि हिमालय क्षेत्र के प्राकृतिक जल स्रोत खासतौर पर वन क्षेत्रों में स्थित जलधाराएं और झरने सूख रहे हैं । इसमें कहा गया है कि उत्तराखंड से गंगा, यमुना, रामगंगा, काली सहित दर्जनों नदियां निकलती हैं, जो उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, हरियाणा, दिल्ली और पश्चिम बंगाल राज्यों को जल आपूर्ति करते है।

इन सभी नदियों में जलप्रवाह ग्लेशियर और अन्य जल स्रोतों से आते हैं । वहीं, हिमालय और पानी संरक्षण पर काम करने वाली विभिन्न संस्थाओं के सहयोग से प्रकाशित “रिपोर्ट ऑफ वर्किंग ग्रुप 1 इनवेंट्री एंड रिवाइवल ऑफ स्प्रिंग्स इन द हिमालयाज फॉर वाटर सिक्योरिटी” के अनुसार, संपूर्ण भारत में 50 लाख धाराएं हैं जिनमें से 30 लाख अकेले भारतीय हिमालय क्षेत्र (आईएचआर) में हैं। 30 लाख में से आधी बारहमासी धाराएं सूख चुकी हैं अथवा मौसमी धाराओं में तब्दील हो चुकी हैं

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