करेंसी स्वैप अरेंजमेंट (CSA) शब्द का अर्थ है मुद्रा की अदला बदली या विनिमय। यह कोई दो देशों के बीच एक मुद्रा विनिमय पूर्व निर्धारित नियमों और शर्तों के साथ मुद्राओं का आदान-प्रदान करने के लिए एक समझौता या अनुबंध है।
केंद्रीय बैंक और सरकारें अल्पकालिक विदेशी मुद्रा तरलता आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए या भुगतान संतुलन (BoP) संकट से बचने के लिए पर्याप्त विदेशी मुद्रा सुनिश्चित करने के लिए विदेशी समकक्षों के साथ मुद्रा स्वैप में संलग्न होती हैं.

उदाहरण के लिए

वर्ष 2018 में भारत और जापान ने एक द्विपक्षीय मुद्रा विनिमय समझौते पर हस्ताक्षर किए। RBI को निश्चित राशि येन में मिलेगी और बैंक ऑफ जापान को भारतीय रुपये में एक निश्चित स्वैप दर के बराबर राशि मिलेगी। एक निर्दिष्ट अवधि के बाद, दोनों देश एक ही स्वैप दर से राशि का भुगतान करेंगे।

भारतीय रिजर्व बैंक ने श्रीलंका के केंद्रीय बैंक के साथ 40 करोड़ डॉलर की मुद्रा अदला- बदली समझौता किया हे। रिजर्व बैंक ने एक विज्ञप्ति में यह जानकारी दी। विज्ञप्ति के मुताबिक श्रीलंका का केंद्रीय बैंक आरबीआई से डॉलर, यूरो या भारतीय रुपये में कई चरणों में मुद्रा की अदला-बदली कर सकता है। यह समझौता दक्षेस मुद्रा अदला-बदली व्यवस्था के तहत किया गया है। यह समझौता 13 नवंबर 2022 तक मान्य रहेगा।

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किन देशों के साथ भारत का सीएसए ?

इसमें ज्यादातर तेल बेचने वाले देश हैं. अग्रणी तेल निर्यातक देशों में अंगोला, अल्जीरिया, नाइजीरिया, ईरान, इराक, ओमान, कतर, वेनेजुएला, सऊदी अरब और यमन जैसे देश हैं जिसके साथ भारत का सीएसए है. कुछ ऐसे देश भी हैं जिनके साथ तेल निर्यात का संबंध नहीं है लेकिन भारत का उनके साथ सीएसए है. इन देशों में जापान, रूस, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया जैसे देश हैं. इसके अलावा सिंगापुर. इंडोनेशिया, मलेशिया, मैक्सिको, दक्षिण अफ्रीका और थाइलैंड भी हैं जिनके साथ सीएसए है.

डॉलर पर निर्भरता कम होती है

CSA का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि तीसरे देश की मुद्रा का व्यापार में उपयोग नहीं किया जा सकेगा। जब दो देश अपनी स्थानीय मुद्रा में व्यापार करते हैं, तो डॉलर या यूरो की कोई आवश्यकता नहीं होगी। इसके कारण, इन दो मुख्य मुद्राओं की आवाजाही अन्य देशों के व्यापार को प्रभावित नहीं करेगी। वर्तमान में, कई विदेशी निवेशक भारत से अपना पैसा निकाल रहे हैं और इसे संयुक्त राज्य में रख रहे हैं, जिससे डॉलर मजबूत हुआ है और रुपया गिर गया है। अब, जब दो देश स्थानीय मुद्रा में व्यापार करते हैं, तो डॉलर की कोई आवश्यकता नहीं होगी और आयात या निर्यात बहुत महंगा नहीं होगा।